ढाई महीने के लिए चैनल देखना क्यों बन्द करें-
बहुत दिनों बाद एक ऐसी अपील देख रहा हूँ कि समझ नही आ रहा ये क्या है? मुझे तो इस अपील को देखकर हँसी आती है। हो सकता है कि आपको यह सही लगे अपने अपने विचार होते हैं। आज मैं एक पत्रकार के अपील पर कुछ अपने विचार रखूंगा आप तय कीजियेगा की उनकी यह अपील कितने हद तक सही है।
● " क्या आप इन ढाई महीने के लिए चैनल देखना बंद नहीं कर सकते? कर दीजिए "
ये अपील रही महानुभाव की अब मैं किसके बारे में बता रहा हूँ आप स्वं समझदार हैं मुझे नाम लेने की जरुरत नहीं तो आइए देखते हैं उनका एक एक पॉइंट और रखते हैं अपने विचार।
1. अगर आप अपनी नागरिकता को बचाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें।
महाज्ञानी पत्रकार द्वारा ये कहा गया है कि अगर आप अपनी नागरिकता को बचाना चाहते हैं तो न्यूज चैनल देखना बन्द कर दें- अब मेरी यह समझ मे नही आया कि ढाई महीने न्यूज न देखने से मेरी नागरिकता कैसे बच जायेगी। और अगर मैं ढाई महीने न्यूज देखता हूँ तो मेरी नागरिकता कैसे खत्म हो जाएगी। हम कई सालों से न्यूज देखते आ रहे हैं हमारी नागरिकता को तो कोई खतरा नहीं हुआ आखिर ढाई महीने में ऐसा क्या होगा महानुभाव जो नागरिकता नहीं बचेगी। और ढाई महीने के बाद न्यूज देखने से नागरिकता को खतरा नहीं होगा ये मुझे कोई बता दे तो उसकी बड़ी कृपा होगी।
2. अगर आप लोकतंत्र में एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में भूमिका निभाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें।
आज तक जो हम लोकतंत्र में जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभा रहे थें वे महान पत्रकार के कहने के अनुसार अगर हम ढाई महीने न्यूज चैनल देखते हैं तो हम जिम्मेदार नागरिक की भूमिका नहीं निभा सकते आखिर क्या ऐसा होने वाला है पत्रकार जी इन ढाई महीनों में जो हम अपनी जिम्मेदारी ही भूल जाएंगे देश के प्रति कृपया बताएं तो आपकी कृपा होगी।
3. अगर आप अपने बच्चों को सांप्रदायिकता से बचाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें।
अब इसपर मैं क्या कहूँ इतने बड़े पत्रकार जब ऐसा कहते हैं तो दुःख भी होता है और उनकी घबराहट भी समझ मे आती है। अब अगर मैं ढाई महीने न्यूज न देखूँ तो हमारे बच्चे साम्प्रदायिकता से बच जायेगें और ढाई महीने के बाद देखने पर कोई दिक्कत नहीं होगी। और इतने सालों से जो हम न्यूज देखते आ रहें हैं कृपया ये बताए कि हम साम्प्रदायिक थें क्या?
4. अगर आप भारत में पत्रकारिता को बचाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। न्यूज़ चैनलों को देखना ख़ुद के पतन को देखना है। मैं आपसे अपील करता हूं कि आप कोई भी न्यूज़ चैनल न देखें। न टीवी सेट पर देखें और न ही मोबाइल पर। अपनी दिनचर्या से चैनलों को देखना हटा दीजिए। बेशक मुझे भी न देखें लेकिन न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कीजिए।
हमारे ढाई महीने न्यूज देखने से पत्रकारिता नहीं बचेगी ये कहना है आपका उसके बाद देखने से पत्रकारिता बाख जाएगी ये कैसे? दूसरी चीज की हमारे जीवन मे बहुत से काम है हम दिनभर न्यूज नहीं देखतें 1 से 2 घण्टे का समय मिलता है न्यूज देखने को तो हमारा पतन कैसे हो जाएगा? आपने कहा कि बेशक मुझे भी न देखें तो हम आपको बता दें कि हम आपका प्राइम टाइम भी देखते हैं और कुछ न्यूज चैनलो की अच्छी चीजें भी देखते हैं 1 से 2 घण्टे में पर हमें तो कभी ऐसा नहीं लगा कि पत्रकारिता खत्म हो जाएगी। हा वो बात अलग है कि कुछ न्यूज मिर्च मसाला लगाकर दिखाया जाता है वो तो आपके भी चैनल पर होता है वो हम नहीं देखते।
5. मैं यह बात पहले से कहता रहा हूं। मैं जानता हूं कि आप इतनी आसानी से मूर्खता के इस नशे से बाहर नहीं आ सकते लेकिन एक बार फिर अपील करता हूं कि बस इन ढाई महीनों के न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दीजिए।
अगर आप हमें मूर्ख समझ रहें हैं और हमे इस मूर्खता से बाहर निकालने के लिए केवल ढाई महीने न्यूज चैनल को न देखने की अपील क्यों कर रहे हैं? आपको तो ये कहना चाहिए कि आप कभी भी न्यूज न देखें और हाँ क्या मैं ढाई महीने बाद न्यूज देखूँ तो मैं मूर्खता से बाहर आकर चालाक हो जाऊँगा, अगर मैं ढाई महीने के बाद न्यूज देखने से चालाक हो जाऊँगा तो मैं ऐसा जरूर करुगा क्योंकि आपके कहने के अनुसार आजतक मैं मुर्ख था। लेकिन इसका स्पष्टीकरण भी तो चाहिए कि मैं कैसे ढाई महीनों के बाद चालाक हो जाऊँगा।
6. पहली बार ऐसा नहीं हो रहा है। जब पाकिस्तान से तनाव नहीं होता है तब ये चैनल मंदिर को लेकर तनाव पैदा करते हैं, जब मंदिर का तनाव नहीं होता है तो ये चैनल पद्मावति फिल्म को लेकर तनाव पैदा करते हैं जब फिल्म का तनाव नहीं होता है तो ये चैनल कैराना के झूठ को लेकर हिन्दू-मुसलमान में तनाव में पैदा करते हैं। जब कुछ नहीं होता है तो ये फर्ज़ी सर्वे पर घंटों कार्यक्रम करते हैं जिनका कोई मतलब नहीं होता है।
क्या बड़ी बात कह दी आपने की पहली बार ऐसा नहीं हो रहा है कि पाकिस्तान से तनाव नही होता है, तनाव पहले भी हुए 26/11 लेकिन सरकार कुछ नहीं कर पाई , पुलवामा में इतने जवान शहीद हुए ये पहली बार थोड़ी न हुआ है लेकिन यह बताइये की हम यह मानकर चुप बैठे की यह पहली बार थोड़ी न हो रहा है जवानों को शहीद होने दें ? इसका उत्तर अगर कोई दे सके तो बड़ी कृपा होगी।
पद्दमावती कि जहां तक बात है रवीश जी हर किसी की भावना का सम्मान करना चाहिए अगर वह राजस्थान सहित अन्य प्रदेशों के लोगो को नहीं अच्छा लगता है तो वे कुछ न कुछ तो विरोध प्रदर्शन करेंगे ही, जैसे SC, ST एक्ट पर प्रदर्शन किया गया दलित भाइयों द्वारा। सबको छूट है। केवल ऐसा नहीं होता कि हिन्दू-मुसलमान में चैनलों द्वारा तनाव पैदा किया जाता है , ऐसा भी देखने को मिलता है टुकड़े, टुकड़े गैंग जो भारत का अपमान करते हैं उन्हें कुछ पत्रकार और मीडिया चैनलों में हीरो दिखाया जाता है।
गलती दोनों तरफ से होती है उसके बारे में भी आप लिखते तो हमे आपके निष्पक्षता पर शक नहीं होता। खैर आपके हिसाब से ढाई महीने बाद न्यूज देखने से ऐसा कुछ नहीं होगा पर ऐसा कैसे होगा मुझे आजतक समझ मे नहीं आया?
7. क्या आप समझ पाते हैं कि यह सब क्यों हो रहा है? क्या आप पब्लिक के तौर पर इन चैनलों में पब्लिक को देख पाते हैं? इन चैनलों ने आप पब्लिक को हटा दिया है। कुचल दिया है। पब्लिक के सवाल नहीं हैं। चैनलों के सवाल पब्लिक के सवाल बनाए जा रहे हैं। यह इतनी भी बारीक बात नहीं है कि आप समझ नहीं सकते। लोग परेशान हैं। वे चैनल-चैनल घूम कर लौट जाते हैं मगर उनकी जगह नहीं होती। नौजावनों के तमाम सवालों के लिए जगह नहीं होती मगर चैनल अपना सवाल पकड़ा कर उन्हें मूर्ख बना रहे हैं। चैनलों को ये सवाल कहां से आते हैं, आपको पता होना चाहिए। ये अब जब भी करते हैं, जो कुछ भी करते हैं, उसी तनाव के लिए करते हैं जो एक नेता के लिए रास्ता बनाता है। जिनका नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है।
क्या सरकार से यह पूछना की आपके रोजगार देने के वादे का क्या हुआ? आपके पाकिस्तान को उसी भाषा मे जवाब देने के वादे का क्या हुआ? स्मार्ट सिटी के वादे का क्या हुआ? बुलेट ट्रेन के वादे का क्या हुआ? सड़क , बिजली , पानी आदि मुद्दों का क्या हुआ यह जनता का सवाल नहीं है तो किसका सवाल है? ये लगभग सभी न्यूज चैनल पूछते हैं और BJP के प्रवक्ता जवाब भी देते हैं आपको इससे घबराहट क्यों हो रही है।
पत्रकार महोदय आपको इस बात पर दुःख व्यक्त करना चाहिए कि राजनीति में ऐसे लोग हैं जो सुप्रीम कोर्ट से जमानत पर बाहर हैं, किसी का पूरा खानदान देश प्रदेश को अपनी जागीर समझ कर हर सदस्य को पार्टी में ले लिया है, कुछ लोग अपने को दलितों की देवी समझ कर दलितों का सबसे बड़ा हितैसी समझकर खुद करोड़ो के महलों में बैठे हैं, और दलितों के लिए कुछ नहीं किये और हर चुनाव में उन्हें दलितों की याद आती है।
किसी राज्य में दूसरे नेता की रैली नहीं होने देना और हेलीकॉप्टर नहीं उतरने देने वाले लोकतंत्र बचाने की बात करते हैं। कोई सत्ता में भ्रष्टाचार खत्म करने की बाद करके हाल फिलहाल राजनीति में आया और खुद की इज्जत बचाने के लिए भ्रष्टाचारियों के साथ मंच साझा कर रहा है। हम वे भी देखते हैं कि क्या हो रहा है हम पागल नहीं है कि किसी न्यूज चैनल पर आँख बंद करके विश्वास कर ले चाहें वह आपका न्यूज चैनल हो या किसी और का।
आपका कहना कि ये मोदी के लिए रास्ता बनाते हैं अगर ऐसे ही रास्ता बनाने से रास्ता बन जाये तो लोग बस न्यूज चैनल को देखकर वोट न दे दें किसी को रैली करने की क्या जरूरत, किसी को गरीबों के बैंक खाते खुलवाने की क्या जरूरत, किसी को पाकिस्तान को उसी भाषा मे जवाब देने की क्या जरूरत, किसी को शौचालय और गरीबों के लिए घर बनवाने की क्या जरूरत, किसी को किसानों को खाद बीज के लिए पैसे देने की क्या जरूरत, गरीबो के लिए आयुष्मान योजना जिससे उनका इलाज हो सके इसकी क्या जरूरत, हर गांव में बिजली पहुचाने की क्या जरुरत, पिछली सरकारों से ज्यादा तेजी से सड़के बनवाने, रेल पटरी बिछवाने की क्या जरूरत, मुद्रा योजना के तहत लोगो को पैसे देने की क्या जरूरत जिससे लोग अपने व्यवसाय को बढ़ा सकें, गरीबो को आरक्षण देने क्या जरूरत, तीन तलाक से पीड़ित महिलाओं के लिए लड़ने की क्या जरूरत, अगर ये सब चीजें सरकार बेकार ही कर रही है हम तो ढाई महीने केवल न्यूज देखकर ही मोदी को वोट कर देगें ये आपकी सोच गलत है।
हम देख रहें कि क्या क्या हो रहा है और पहले क्या क्या हो रहा था ऐसा नहीं कि न्यूज को देखकर किसी को वोट दे दें। हम उन्हें भी देखते हैं जो दलितों के हितैसी बनते हैं और महलों में रहते हैं हम उन्हें भी देखते हैं जिनका पूरा खानदान देश प्रदेश को अपनी जागीर समझता है, हम उन्हें भी देखते हैं जो लोकतंत्र बचाने की बात करते हैं और खुद किसी विशेष पार्टी की रैली नहीं होने देते, हम टुकड़े टुकड़े गैंग को भी देखते हैं और उनको समर्थन करने वाले राजनेता और पत्रकार को भी, हम उन्हें भी देखते हैं जिन्होंने करोड़ो टैक्स नहीं भरा है और जमानत पर बाहर हैं, हम उन्हें भी देखते हैं जो भ्रष्टाचार मिटाने की बात करके आएं और खुद भ्रष्टाचारियों से मिल गए।
हम सब देखते हैं और तब तय करते हैं कि किसे वोट दे किसे नहीं केवल ढाई महीने न्यूज देखकर हम वोट नहीं कर देतें।
8. मैं भाजपा समर्थकों से भी अपील करता हूं कि आप इन चैनलों को न देखें। आप भारत के लोकतंत्र की बर्बादी में शामिल न हों। क्या आप इन बेहूदा चैनलों के बग़ैर नरेंद्र मोदी का समर्थन नहीं कर सकते? क्या यह ज़रूरी है कि नरेंद्र मोदी का समर्थन करने के लिए पत्रकारिता के पतन का भी समर्थन किया जाए? फिर आप एक ईमानदार राजनीतिक समर्थक नहीं हैं। क्या श्रेष्ठ पत्रकारिता के मानकों के साथ नरेंद्र मोदी का समर्थन करना असंभव हो चुका है? भाजपा समर्थकों, आपने भाजपा को चुना था, इन चैनलों को नहीं। मीडिया का पतन राजनीति का भी पतन है। एक अच्छे समर्थक का भी पतन है।
वाह! क्या अपील है कि भाजपा के समर्थक इन न्यूज चैनल को न देखें तो वे क्या उस न्यूज चैनल को देखें जो टुकड़े टुकड़े गैंग का समर्थन करते हैं, नक्सलियों का समर्थन करते हैं , उनको सरकार द्वारा किया हुआ एक काम भी अच्छा नहीं लगता क्या उन्हें देखें कृपया जरूर बताएं?
लोकतंत्र की बर्बादी ये कुछ पत्रकार अपने आप को क्या समझते हैं कि लोकतंत्र यही बनाएं हुए हैं दूसरे चैनल वाले तो लोकतंत्र खत्म कर रहे हैं अरे मेरे भाई देश ने आपातकाल का समय भी देखा है उसके बाद भी लोकतंत्र खत्म नहीं हुआ तो आपके कहने से ढाई महीने में लोकतंत्र खत्म हो जाएगा।
और जहाँ तक बाद मोदी के समर्थन की है तो लोग उस समय भी मोदी का समर्थन करते थे जब गोधरा कांड हुआ और सारे मीडिया वाले मोदी को दिन रात हत्यारा बनाने की कोशिश में जुटे थे। आज की बात तो कुछ और है मोदी समर्थक न्यूज देखकर समर्थन नहीं करते वे तब से समर्थन करते हैं जब मीडिया और सरकार उनको गलत साबित करने में लगी थी अगर न्यूज देखकर ही समर्थन करना होता तो लोग मोदी से नफरत करतें समर्थन नहीं क्योंकि गोधरा के बाद कुछ ऐसा ही मीडिया में चला था।
9. प्रधानमंत्री मोदी पत्रकारिता के इस पतन के अभिभावक हैं। संरक्षक हैं। उनकी भक्ति में चैनलों ने ख़ुद को भांड बना दिया है। वे पहले भी भांड थे मगर अब वे आपको भांड बना रहे हैं। आपका भांड बन जाना लोकतंत्र का मिट जाना होगा।
जलन तो किसी आदमी से होना स्वाभाविक है पर जब इतना जलन हो तो स्वास्थ्य खराब हो जाता है प्रिय पत्रकार महोदय, आपातकाल मे पत्रकारिता का पतन नहीं हुआ था क्या? इसपर भी दो शब्द लिख देतें। जब मीडिया मोदी के पीछे पड़ी थी कि उनको दिन रात गलत साबित करने में लगी थी तो उस समय पत्रकारिता का अभिभावक कौन था इसके बारे में कोई बताए तो अच्छा होगा, एक आदमी से इतनी नफऱत मुझे समझ मे नहीं आती की आप अपने आप को सही समझे और पूरी दुनिया गलत पूरे न्यूज चैनल गलत केवल आप सही ये तो केजरीवाल वाला हाल है, जो अपने आप को ईमानदार समझते हैं बाकी पूरा भारत बेईमान हालाकिं आजकल सत्ता के लालच में उनको भी भाजपा के अलावा सारी पार्टियां ईमानदार नजर आ रहीं हैं।
मैं आपके ढाई महीने के अपील के बारे में बहुत कुछ लिख सकता था आपके सारे कथन का जवाब दे सकता था लेकिन समझदार के लिए इतना काफी है, और आपने जो भक्त शब्द का प्रयोग किया है मेरा अगला लेख उसी के ऊपर होगा कि असल में भक्त कौन है, भाजपा या कांग्रेस समर्थक जो तथ्यों के साथ और तर्क पर आधारित होगा। आपलोगो से एक अपील है कि अगर यह लेख आपको अच्छा लगा हो तो कृपया इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि और लोग ढाई महीने के अपील के बारे में पत्रकार महोदय के घबराहट के बारे में समझ सकें|
लेखक - राजेन्द्र गौतम
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